इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के सत्र में शासन में साक्ष्य आधारित एआई अपनाने पर जोर
बैंकिंग और वित्त में उन्नत एआई के उपयोग के लिए मजबूत और उच्च-गुणवत्ता वाला डेटा आवश्यक
एआई के माध्यम से सार्वजनिक सेवाओं की डिलीवरी को मजबूती प्रदान करने के लिए वैज्ञानिक प्रमाणिकता और जिम्मेदार ढांचे महत्वपूर्ण
लाभार्थी की पहचान के लिए एआई प्रणालियों को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले उचित परिश्रम आवश्यक
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के दूसरे दिन के सत्र "शासन में एआई : सरकारी कार्यकुशलता में क्रांतिकारी बदलाव" के तहत वैश्विक शोधकर्ता और वरिष्ठ नीति निर्माता इस बात पर विचार-मंथन करने के लिए एक साथ आए कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सार्वजनिक सेवाओं की डिलीवरी को बड़े पैमाने पर कैसे मजबूती प्रदान कर सकती है। सत्र में चर्चा प्रायोगिक परियोजनाओं और वादों से आगे बढ़कर आकलन योग्य प्रभाव की दिशा में केंद्रित रहीं, जिसमें सरकार के विभिन्न स्तरों पर कड़ी मूल्यांकन प्रक्रिया, जिम्मेदार उपयोग और प्रणालीगत-स्तर पर तत्परता पर विशेष रुप से ध्यान केंद्रित किया गया।
सत्र की शुरुआत डीन कार्लन द्वारा एक शोध प्रस्तुति से हुई, जिसमें टोगो में सार्वजनिक सेवाओं की डिलीवरी को लक्षित करने को बेहतर बनाने में मशीन लर्निंग के उपयोग के बारे में चर्चा की गई। इस अध्ययन ने यह दर्शाया कि जब एआई-समर्थित लक्षित डिलीवरी लागू की गई तो खाद्य सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक संकेतकों में स्पष्ट सुधार हुआ।
हालांकि, इस अध्ययन ने कुछ महत्वपूर्ण सीमाओं को भी जाहिर किया जैसे : अकेला फोन मेटाडेटा उपचार के प्रभाव जानने में असफल रहा, जिससे मॉडल में बदलाव और शॉर्ट-टर्म संवेदनशीलता का अनुमान लगाने की राह में आने वाली चुनौतियों का पता चला।
इन निष्कर्षों ने कड़े परीक्षण, पुनरावृत्त परीक्षण और साक्ष्य-आधारित एआई खरीद की आवश्यकता को और अधिक मजबूत किया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि एआई प्रणालियों को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले उनका सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए, खासकर जब इन्हें लाभार्थियों की पहचान, संसाधनों का आवंटन या नीति निर्णयों को सूचित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो।
इसके पश्चात सत्र में आयोजित एक पैनल चर्चा में शासन में एआई लागू करने के संबंध में भारत की तैयारियों पर विचार-विमर्श किया गया। यद्यपि कंप्यूट क्षमता बनाने, डेटा साइलो को तोड़ने और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के कौशल उन्नयन में प्रगति दिख रही है, फिर भी विशेषतौर पर मापनीयता या स्केलेबिलिटी, डेटा विविधता और नैतिक स्पष्टता के मुद्दों को लेकर महत्वपूर्ण चुनौतियां बनी हुई हैं । इस बात पर गौर किया गया कि एआई कार्यान्वयनकर्ताओं का छोटा अनुपात ही अपने नैतिक प्रारुपों को बखूबी समझता है, जो शासन की खामी को उजागर करता है, जिसे तकनीकी क्षमता के साथ-साथ सुधारना आवश्यक है।
इंडिया एआई मिशन, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के निदेशक श्री मोहम्मद वाई. सफिरुल्ला ने मौजूदा परिप्रेक्ष्य का आकलन करते हुए कर विश्लेषण और व्यय ट्रैकिंग सहित बैंकिंग और वित्तीय प्रणालियों जैसे उन क्षेत्रों की ओर इंगित किया, जिनमें उच्च-गुणवत्ता वाले संरचित डेटा की उपलब्धता के कारण एआई अपनाने में प्रगति हुई है।
इसके विपरीत, शिक्षा और अन्य नागरिक-केंद्रित सेवाओं जैसे क्षेत्रों को डेटा विविधता और निर्णय लेने में अस्पष्टता के कारण अधिक जटिलता का सामना करना पड़ता है। सावधानीपूर्वक डिज़ाइन किए गए प्रयोग, तृतीय-पक्ष ऑडिट और मजबूत प्रमाणन प्रोटोकॉल की आवश्यकता को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए ज़रूरी बताया गया। उन्होंने कोविड के दौरान संपन्न एक अनसुपरवाइज्ड लर्निंग का उदाहरण देते हुए यह याद किया कि उच्च गुणवत्ता वाले डेटा की उपलब्धता ने पूर्वानुमान कार्रवाई को संभव बनाया।
सत्र के दौरान एक महत्वपूर्ण विषय यह था कि सबसे पहले तत्काल संचालनात्मक समस्याओं का समाधान किया जाए, और एआई का उपयोग स्पष्ट, उच्च-प्रभाव वाली समस्याओं को हल करने के लिए किया जाए, इससे पहले कि व्यापक प्रणालीगत परिवर्तन का प्रयास किया जाए। वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि मध्यवर्ती परिणामों को मापना, कड़ी पायलट परियोजनाएं करना और तृतीय-पक्ष ऑडिट को संस्थागत रूप से लागू करना सार्वजनिक विश्वास बनाने और यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होगा कि एआई लागू करना प्रभावी और समान रूप से लाभकारी हो।
सत्र ने मुख्य निष्कर्ष पर जोर दिया कि मजबूत डेटा, वैज्ञानिक प्रमाणिकता और जिम्मेदार गवर्नेंस ढांचे पर आधारित होने पर ही एआई का उपयोग सरकार की कार्यकुशलता और सेवाओं की डिलीवरी में महत्वपूर्ण रूप से सुधार ला सकता है।
