डॉ. जितेंद्र सिंह ने पहाड़ी इलाकों के लिए “स्टील” स्लैग वाली सड़कों पर जोर दिया
अगले सप्ताह जम्मू एवं कश्मीर से शुरू होकर विभिन्न पहाड़ी राज्यों/केन्द्र-शासित प्रदेशों में कार्यशाला की योजना
सीएसआईआर की सड़क मरम्मत तकनीक अब बाजार में आ रही है, क्योंकि प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) ने उद्योग भागीदार के साथ समझौता किया है
‘ईकोफिक्स’ नाम का उपयोग के लिए तैयार गड्ढों को भरने वाला मिश्रण स्टील स्लैग को टिकाऊ एवं त्वरित मरम्मत के विकल्प के रूप में बदलने में सक्षम
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह कहते हुए कठिन व पहाड़ी इलाकों में टिकाऊ सड़क निर्माण के लिए स्टील स्लैग-आधारित तकनीक के उपयोग की सिफारिश की कि हिमालयी राज्यों तथा केन्द्र-शासित प्रदेशों में इसे अपनाने की प्रक्रिया अभी भी सीमित है और लक्षित संवाद एवं प्रशिक्षण के जरिए इसे तेज करने की जरूरत है।
प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) और विशाखापत्तनम स्थित उद्योग भागीदार “रामूका ग्लोबल इको वर्क प्राइवेट लिमिटेड” के बीच ईकोफिक्स, जो उपयोग के लिए तैयार गड्ढों को भरने वाला एक मिश्रण है, के वाणिज्यिक उत्पादन के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए, केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि विभिन्न राज्य एजेंसियों को इस तकनीक से परिचित कराने हेतु अब कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं।
केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि स्टील स्लैग तकनीक पर दो-दिवसीय कार्यशाला अगले सप्ताह जम्मू एवं कश्मीर में होगी। इसके बाद अन्य राज्यों एवं केन्द्र-शासित प्रदेशों में भी यह कार्यशाला आयोजित की जाएगी। इसका उद्देश्य सड़क निर्माण विभागों के इंजीनियरों और अधिकारियों को इसके उपयोग एवं लाभों के बारे में अवगत कराना है। केन्द्रीय मंत्री के अनुसार, कई हिमालयी एवं पहाड़ी राज्यों को इस तकनीक से सबसे अधिक लाभ होगा क्योंकि वहां काम करने का मौसम छोटा होता है, भारी बारिश होती है और सड़कें बार-बार खराब होती हैं। फिर भी, जमीनी स्तर पर जागरूकता अभी भी एक जैसी नहीं है।
इस तकनीक की यात्रा के बारे में बताते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि इसके परीक्षण लगभग दो वर्ष पहले शुरू हुए थे। परीक्षण की शुरुआत गुजरात के सूरत और अरुणाचल प्रदेश सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र के कुछ हिस्सों में प्रायोगिक परियोजनाओं के रूप में हुई थी। तब से, स्टील स्लैग आधारित सड़क मरम्मत के तरीकों का उपयोग कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, असम, गुजरात, झारखंड और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में अलग-अलग स्तरों पर किया गया है। हालांकि, उन्होंने बताया कि कुछ राज्यों के वरिष्ठ इंजीनियरों सहित कई संभावित उपयोगकर्ताओं को फिर भी इसकी उपलब्धता के बारे जानकारी नहीं थी। यह सरकारी एजेंसियों और उद्योग भागीदारों, दोनों द्वारा सक्रिय रूप से जानकारी फैलाने की जरूरत को दर्शाता है।
इस अवसर पर एक समझौते को औपचारिक रूप भी दिया गया, जिससे ‘ईकोफिक्स’ की वाणिज्यिक शुरुआत हो सकेगी। यह गड्ढों को भरने वाला एक मिश्रण है, जिसे सीएसआईआर - केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) ने विकसित किया है और अब टीडीबी के सहयोग से से इसे बाजार में लाया जा रहा है। इस उत्पाद में प्रसंस्कृत लौह एवं इस्पात स्लैग का उपयोग होता है, जिससे औद्योगिक अपशिष्ट को निर्माण सामग्री में बदला जाता है। इसे उपयोग के लिए तैयार एक मिश्रण के तौर पर डिजाइन किया गया है जिसे गीली या जलभराव वाले स्थानों पर भी लगाया जा सकता है, जिससे मरम्मत में लगने वाले समय और यातायात में व्यवधान में कमी आती है।
अधिकारियों ने बताया कि इस तकनीक का भारतीय मौसम एवं यातायात की स्थितियों में प्रयोगशाला सत्यापन और मैदानी परीक्षण किया गया है। विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि मरम्मत के पारंपरिक तरीकों की तुलना में यह अधिक टिकाऊ है और इसकी जीवनचक्र लागत भी कम है। स्टील स्लैग का उपयोग प्राकृतिक निर्माण सामग्रियों पर निर्भरता कम करने और औद्योगिक अपशिष्टों के निपटान की चुनौती से निपटने जैसे चक्रीय अर्थव्यवस्था के बड़े लक्ष्यों के अनुरूप भी है।
कार्यक्रम में बोलते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक निधि से होने वाले अनुसंधानों का नतीजा लोगों को दिखने योग्य लाभों के रूप में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईकोफिक्स जैसे नवाचार यह दर्शाते हैं कि विज्ञान कैसे प्रयोगशाला से निकलकर रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो सकता है और गड्ढों जैसी आम लेकिन जरूरी समस्याओं को हल कर सकता है, जो सड़क सुरक्षा, गाड़ियों को होने वाले नुकसान और यात्रियों के तनाव को प्रभावित करती हैं। उन्होंने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के बदलते स्वरूप पर भी जोर दिया और कहा कि इस परियोजना में निजी क्षेत्र के साझेदार का निवेश सरकारी मदद के बराबर था, जो अपेक्षाकृत अधिक संतुलित सहयोग की दिशा में एक बदलाव का संकेत है।
प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड विशाखापत्तनम की एक कंपनी के साथ मिलकर लगभग दो लाख टन वार्षिक क्षमता वाले लौह एवं इस्पात स्लैग प्रसंस्करण केन्द्र स्थापित करने की योजना बना रहा है, जिसका वाणिज्यिक उत्पादन 2027 के अंत तक शुरू होने की उम्मीद है। बड़े इस्पात संयंत्र के निकट होने से कच्चे माल की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित होने की उम्मीद है और साथ ही इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार भी सृजित होंगे।
अंत में, केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि स्टील स्लैग तकनीक को व्यापक पैमाने पर अपनाने से राज्यों को अधिक मजबूत सड़कें बनाने में मदद मिल सकती है, खासकर उन इलाकों में जहां भारी बारिश और खराब मौसम होता है। साथ ही, इससे टिकाऊपन में वृद्धि होगी और लागत में भी कमी आएगी। उन्होंने मीडिया और राज्य सरकारों से जागरूकता फैलाने में भूमिका निभाने का आग्रह किया ताकि ऐसी तकनीक उन इलाकों तक पहुंच सके जहां इसकी सबसे अधिक जरूरत है, खासकर हिमालयी क्षेत्र में।
समझौते पर हस्ताक्षर समारोह में सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. कलैसेल्वी, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड के सचिव राजेश कुमार पाठक, सीएसआईआर-केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. सी.एच. रवि शेखर, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड एवं वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ अधिकारी और रामुका ग्लोबल इको वर्क प्राइवेट लिमिटेड के प्रतिनिधि शामिल हुए।
केन्द्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह मंगलवार को नई दिल्ली में नेशनल मीडिया सेंटर (एनएमसी) में प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) और विशाखापत्तनम स्थित रामुका ग्लोबल इको वर्क प्राइवेट लिमिटेड के बीच इकोफिक्स, जो उपयोग के लिए तैयार गड्ढों को भरने वाला मिश्रण है, के वाणिज्यिक उत्पादन से संबंधित एक समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान बोलते हुए।
