मत्स्य पालन विभाग का नीली क्रांति में स्वदेशी पर बल
भारत में मत्स्यपालन में स्वदेशी प्रजातियों को बढ़ावा देना
हिमालयी नदियों से लेकर हिंद महासागर के तटीय जल तक फैले भारत के विविध जलीय इको-सिस्टम में स्वदेशी मछली प्रजातियों का भंडार है। यह देश के पारिस्थितिक संतुलन और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं। इन स्वदेशी प्रजातियों का संवर्धन न केवल मत्स्य पालन की स्थिरता के लिए बल्कि खाद्य सुरक्षा बढ़ाने, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को समर्थन देने और जैव विविधता के संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। देश में मछली उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा करने और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के प्रयासों के बीच, देशी मछली प्रजातियों का रणनीतिक संवर्धन देश की समृद्ध जलीय विरासत को संरक्षित करते हुए इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
स्थानीय या देशी प्रजातियां वे हैं जो विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों और जलीय वातावरणों के अनुकूल विकसित और अनुकूलित हुई हैं। भारत में, इन प्रजातियों में मीठे पानी, खारे पानी और समुद्री मछलियों की एक विस्तृत विविधता शामिल है। इनमें से प्रत्येक की अपनी अनूठी पारिस्थितिक भूमिका और आर्थिक महत्व है। 2800 से अधिक स्थानीय मछली और शंख प्रजातियों की पहचान की गई है। इनमें से 917 प्रजातियाँ मीठे पानी से, 394 प्रजातियां खारे पानी से और 1548 प्रजातियां समुद्री हैं (स्रोत: आईसीएआर-एनबीएफजीआर)।
इन वर्षों में देश ने व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण 80 से अधिक मछली/शंख प्रजातियों के लिए प्रजनन और बीज उत्पादन प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं। हालांकि, देश के मत्स्य पालन उत्पादन में मुख्य योगदान कुछ चुनिंदा प्रजातियों का ही है। तीन प्रमुख कार्प प्रजातियां, रोहू, कतला और मृगाल तथा विशाल मीठे पानी का झींगा, भारतीय मीठे पानी के मत्स्य पालन का आधार हैं। परिणामस्वरूप, देश में मीठे पानी के मत्स्य पालन से उत्पादित 19.50 मिलियन टन मछली में से तीन-चौथाई से अधिक भारतीय प्रमुख कार्प प्रजातियों का योगदान है। खारे पानी के मत्स्य पालन में, वर्तमान उत्पादन का अधिकांश हिस्सा एक ही विदेशी झींगा प्रजाति ( पेनायस वन्नामेई) का है, जबकि स्वदेशी ब्लैक टाइगर झींगा ( पेनायस मॉनडॉन ) का योगदान बहुत कम है । देश में समुद्री मत्स्य पालन अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है।
देश में मत्स्यपालन विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए, मीठे पानी, खारे पानी और समुद्री वातावरण में मत्स्यपालन के लिए महत्वपूर्ण संभावित स्वदेशी मछली प्रजातियों को प्राथमिकता देना आवश्यक महसूस किया जा रहा है। आर्थिक महत्व और क्षेत्रीय महत्व के आधार पर निम्नलिखित स्वदेशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई है: 1. फ्रिंज्ड-लिप्ड कार्प ( लेबियो फ़िम्ब्रिएटस), 2. ऑलिव बार्ब ( सिस्टोमस सराना ), 3. पेंग्बा ( ओस्टियोब्रामा बेलांगेरी), 4. स्ट्राइप्ड मुर्रेल ( चन्ना स्ट्रिएटा), 5. पाब्दा ( ओमपोक एसपीपी), 6. सिंघी ( हेटेरोप्नेस्टेस फॉसिलिस ), 7. एशियन सीबास ( लेट्स कैल्केरिफ़र), 8. पर्लस्पॉट ( एट्रोप्लस सुराटेन्सिस ), 9. पोम्पानो ( ट्रैकिनोटस एसपीपी.), 10. मड क्रैब ( स्काइला एसपीपी.), 11. पेनायस इंडिकस।
ऊपर चयनित प्रजातियां मत्स्यपालन के लिए उत्कृष्ट उम्मीदवार मानी जाती हैं, और इनका प्रजनन, बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन की तकनीकें और पालन-पोषण की पद्धतियां पहले से ही उपलब्ध हैं। ये प्रजातियां समुदायों और उनके जलीय वातावरण के बीच गहरे सम्बंध को दर्शाती हैं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को बढ़ावा देती हैं। ये प्रजातियां न केवल सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों के भरण-पोषण के लिए भी आवश्यक हैं, क्योंकि स्थानीय और क्षेत्रीय बाजारों में इनका उच्च मूल्य है। ये लाखों लोगों के आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मत्स्यपालन उत्पादन और आय में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।
स्वदेशी मछली प्रजातियों को बढ़ावा देने के लाभों के बारे में अक्सर जागरूकता और तकनीकी ज्ञान की कमी पाई जाती है। यह कमी इन प्रजातियों को मत्स्य पालन प्रणालियों में एकीकृत करने के प्रयासों में बाधा डालती है। इसलिए, हितधारकों को शिक्षित करना और स्वदेशी प्रजातियों के प्रजनन, बीज उत्पादन और विकास प्रक्रियाओं के लाभों और तकनीकों पर प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक है। भारत मत्स्य प्रबंधन और पर्यावरणीय स्थिरता की जटिलताओं से जूझ रहा है, ऐसे में इन स्वदेशी मछली प्रजातियों को बढ़ावा देना एक आशाजनक मार्ग प्रदान करता है। जलीय संसाधनों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और समृद्धि को सुनिश्चित करने के लिए इन प्रजातियों के अद्वितीय पारिस्थितिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मूल्यों का लाभ उठाकर, भारत मत्स्य पालन के लिए अधिक संतुलित और टिकाऊ दृष्टिकोण अपना सकता है।
अंतर्देशीय और जलीय कृषि मिलकर भारत के मछली उत्पादन में 75 प्रतिशत से अधिक का योगदान करते हैं, जो मछली पकड़ने की पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में मत्स्य पालन प्रणालियों के प्रभुत्व को दर्शाता है। इसलिए, सरकार का मत्स्य विभाग (डीओएफ) अपनी मौजूदा योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई), नई उप-योजना प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (पीएमएमकेएसवाई) और मत्स्य एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (एफआईडीएफ) के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण और किफायती बीज और चारा की आपूर्ति में अंतर को पाटने और प्रशिक्षण एवं कार्यशालाओं के माध्यम से जनसमुदाय को तकनीकी ज्ञान का प्रसार करने के लिए काम कर रहा है। पीएमएमएसवाई देश में मत्स्य पालन क्षेत्र के विकास और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई एक व्यापक योजना है। इसके प्राथमिक उद्देश्य जलीय कृषि उत्पादकता बढ़ाना, मछुआरों की आजीविका में सुधार करना और जलीय संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित करना है। यह योजना, जलीय कृषि का विस्तार, प्रजातियों का विविधीकरण और आनुवंशिक सुधार जैसे कई प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित है। ये प्रयास भूमि और जल संसाधनों के उत्पादक उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो इस क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यक हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) अपने विभिन्न अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से स्वदेशी मछली प्रजातियों पर व्यापक शोध करता है, इसमें उनकी जीव विज्ञान, प्रजनन संबंधी आदतें, व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछली और शंख प्रजातियों के आनुवंशिक सुधार कार्यक्रम और पर्यावास सम्बंधी आवश्यकताओं का अध्ययन शामिल है। आईसीएआर लुप्तप्राय और संकटग्रस्त स्वदेशी मछली प्रजातियों के संरक्षण के लिए पर्यावास संरक्षण, प्रजनन कार्यक्रमों और आनुवंशिक संरक्षण हेतु रणनीतियों का विकास और कार्यान्वयन करके भी सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है।
मत्स्य विभाग ने आईसीएआर के परामर्श से कुछ स्वदेशी प्रजातियों का आनुवंशिक सुधार हेतु चयन किया है और गुणवत्तापूर्ण एवं स्वस्थ बीज उत्पादन के लिए आईसीएआर के मत्स्य संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान की है। चयनित प्रजातियां हैं: (i) स्कैम्पी, (ii) रोहू, (iii) कतला, (iv) मुर्रेल, (v) पी. इंडिकस , (vi) पी. मोनोडॉन और (v) इंडियन पोम्पानो । इसके अतिरिक्त, विभाग ने पीएमएमएमएसवाई के तहत आईसीएआर-केंद्रीय मीठे जल मत्स्य पालन संस्थान (आईसीएआर-सीआईएफए), भुवनेश्वर में मीठे जल मत्स्य पालन प्रजातियों के लिए और आईसीएआर-केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीएमएफआरआई), मंडपम के क्षेत्रीय केंद्र में समुद्री प्रजातियों के लिए नाभिकीय प्रजनन केंद्र (एनबीसी) की स्थापना को भी मंजूरी दी है।
मत्स्य विभाग ने क्षेत्रीय महत्व के आधार पर स्वदेशी प्रजातियों के उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टर अधिसूचित किए हैं। इनका उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना, मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना और ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को रोजगार प्रदान करना है। कुल 34 क्लस्टर अधिसूचित किए गए हैं, जिनमें पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप आदि में उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टर का विकास शामिल है। स्वदेशी प्रजातियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए क्लस्टर इस प्रकार हैं: (i) ओडिशा में स्कैम्पी क्लस्टर, (ii) तेलंगाना में मुर्रेल क्लस्टर, (iii) त्रिपुरा में पाबदा क्लस्टर, (iv) मणिपुर में पेंगबा क्लस्टर, (v) जम्मू और कश्मीर में ट्राउट क्लस्टर, (vi) लद्दाख में ट्राउट क्लस्टर, (vii) केरल में पर्ल स्पॉट क्लस्टर, (viii) कर्नाटक में पिंजरा संस्कृति के माध्यम से समुद्री स्वदेशी प्रजातियों को बढ़ावा देना, (ix) मदुरै में सजावटी मत्स्य पालन क्लस्टर।
